छत्तीसगढ़ सरकार ने शुरू की मुहिम, अब ऑनलाइन बेचे जा रहे उपले और गोबर से बने प्रोडक्ट

गांवों में किसान की जीविका का साधन पशु और खेती होती है। यही वजह है कि पशुओं को पशुधन बुलाया जाता है। किसान खेती से निकलने वाले भूसे से लेकर गोबर के उपले बनाने तक हर तरह से खेती और अपने पशुओं का उपयोग करता है, ताकि अपनी जीविका को चलाया जा सके। हाल फिलहाल में ऑनलाइन दुनिया के प्रसार के साथ गोबर से बनने वाली वस्तुओं की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है।


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जिसे देखते हुए छत्तीसगढ़ सरकार ने एक कदम उठाया है ताकि गोबर के उत्पादों की बिक्री तेजी से हो, इसके लिए एक बाजार शुरू किया है। इसकी शुरुआत स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से हो रही है। मीडिया में छपी खबरों के मुताबिक इस मुहिम में 354 स्वयं सहायता समूहों को जोड़ा गया है जिसमें 4,000 से ज्यादा महिलाएं शामिल हैं। ये महिलाएं जो भी गोबर से बने उत्पाद बनाएंगी उन्हें ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर उपलब्ध कराया जाएगा। इस तरह से, किसी भी शहर में रहने वाले लोग इन वस्तुओं को खरीद सकते हैं। तीज त्योहार में इन चीजों की जरूरत बड़े शहरों में बहुत महसूस की जाती है और यह मुहिम इसी के लिए शुरू की गई है। अब आप जानना चाहते होंगे कि ये स्वयं सहायता समूह कौन-कौन से गोबर से बने प्रोडक्ट बना रहे हैं, तो आपको बता दें कि इनमें खाद, गोबर से बने कंडे (उपले), दिये और फूलदान शामिल हैं।


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इस मुहिम को लेकर राजनांदगांव के कलेक्टर तरण प्रकाश सिन्हा काफी उत्साहित हैं। उन्होंने आंकड़ों की जानकारी देते हुए कहा है कि जिले की महिलाओं के द्वारा बनाए गए 5 करोड़ रुपये के गोबर प्रोडक्ट बेचे जा चुके हैं। साथ ही जो ऑनलाइन माध्यम में बेचना हाल फिलहाल में शुरू हुआ, उसके जरिए 1 लाख रुपये तक के प्रोडक्ट की बिक्री हो चुकी है। साथ ही ऑनलाइन माध्यम के जरिए बिक्री में बढ़ोतरी हर गुजरते दिन के साथ हो रही है।


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छत्तीसगढ़ सरकार छोटे मझोल किसानों के लिए अक्सर ही ऐसी योजनाएं लाती रहती है ताकि उन्हें सशक्त बनाया जा सके। पिछले महीनों सरकार ने गोधन न्याय योजना शुरू की थी। इस योजना के अंतर्गत डेयरी किसानों से 2 रुपये प्रति किलो खरीदा गया था और इस तरह से सरकार ने 66,400 क्विंटल गोबर की खरीदारी की थी। बहरहाल, ऑनलाइन पहले के साथ सरकार ने एक और मील का पत्थर छूने की कवायद शुरू कर दी है। गोबर की खाद को लेकर अक्सर बातें होती रहती हैं इसलिए इसकी मांग भी खूब है। इसी बात को ध्यान में रखते हुए स्वयं सहायता समूह वर्मीकंपोस्ट बनाने में जुटे हुए हैं। आलम यह है कि अब तक 53,000 क्विंटल वर्मीकंपोस्ट स्वयं सहायता समूह बेच चुके हैं। इसके पहले खाद केवल गौशालाओं और किसानों को बेची जा रही थी लेकिन अब ऑनलाइन माध्यम से इसकी पहुंच देश भर में है और इनकी वर्मीकंपोस्ट की मांग तेजी से बढ़ी है। कई राज्यों से लाखों रुपये के ऑर्डर पहले से ही मिल चुके हैं।